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कुंडली मिलान
अष्टकूट गुण मिलान कैसे काम करता है और 36 में से अंकों का अर्थ।
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कुंडली मिलान कैलकुलेटरकुंडली मिलान क्या है?
विवाह से पहले दो कुंडलियों की तुलना को कुंडली मिलान कहते हैं। उत्तर भारत में सबसे प्रचलित विधि अष्टकूट है, जो दोनों के जन्म चंद्र नक्षत्र और राशि पर आधारित है।
आठ कूट — एक नज़र में
वर्ण (1), वश्य (2), तारा (3), योनि (4), ग्रह मैत्री (5), गण (6), भकूट (7) और नाड़ी (8) — कुल 36 गुण। परंपरा में 18 से अधिक गुण सामान्यतः स्वीकार्य माने जाते हैं।
1. वर्ण कूट (1 गुण)
चंद्र राशि के आधार पर चार वर्ण माने जाते हैं — ब्राह्मण (कर्क, वृश्चिक, मीन), क्षत्रिय (मेष, सिंह, धनु), वैश्य (वृषभ, कन्या, मकर) और शूद्र (मिथुन, तुला, कुंभ)। परंपरा में इसे स्वभाव और कार्य-रुचि के मेल का संकेत माना जाता है, जन्म या जाति का नहीं। वर का वर्ण कन्या के समान या ऊँचा हो तो 1 गुण, अन्यथा 0।
2. वश्य कूट (2 गुण)
राशियों को पाँच वर्गों में बाँटा जाता है — चतुष्पद, मानव (द्विपद), जलचर, वनचर और कीट। यह कूट आपसी आकर्षण और एक-दूसरे पर प्रभाव को दर्शाता है। समान वर्ग पर 2 गुण, अनुकूल पर 1 या आधा, और विरोधी वर्ग पर 0।
3. तारा कूट (3 गुण)
कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक, और वर से कन्या तक गिनती करके 9 से भाग दिया जाता है। शेष 3 (विपत), 5 (प्रत्यरि) या 7 (वध) अशुभ माने जाते हैं। दोनों दिशाएँ शुभ हों तो 3 गुण, एक शुभ हो तो 1.5, दोनों अशुभ हों तो 0। यह भाग्य और स्वास्थ्य के मेल का संकेत माना जाता है।
4. योनि कूट (4 गुण)
हर नक्षत्र को एक पशु योनि दी गई है — जैसे अश्व, गज, सर्प, श्वान, मार्जार, मूषक आदि, कुल 14। यह शारीरिक और स्वभावगत अनुकूलता दिखाती है। समान योनि पर 4 गुण, मित्र पर 3, सम पर 2, शत्रु पर 1 और परम शत्रु (जैसे गौ–व्याघ्र, मार्जार–मूषक) पर 0।
5. ग्रह मैत्री कूट (5 गुण)
दोनों की चंद्र राशि के स्वामी ग्रहों की आपसी मित्रता देखी जाती है। यह मानसिक तालमेल और सोच के मेल का संकेत है। एक ही स्वामी या परस्पर मित्र होने पर 5 गुण; मित्र–सम पर 4; दोनों सम पर 3; मित्र–शत्रु पर 1; सम–शत्रु पर 0.5; परस्पर शत्रु पर 0।
6. गण कूट (6 गुण)
नक्षत्रों को तीन गणों में बाँटा गया है — देव, मनुष्य और राक्षस। यह स्वभाव और व्यवहार की अनुकूलता दर्शाता है। समान गण पर 6 गुण, देव–मनुष्य पर 5 या 6, मनुष्य–राक्षस और देव–राक्षस पर सामान्यतः 0 या 1।
7. भकूट कूट (7 गुण)
दोनों की चंद्र राशियों की आपसी दूरी देखी जाती है। 1/7, 3/11, 4/10 की स्थिति शुभ मानी जाती है और 7 गुण मिलते हैं। 2/12, 5/9 और 6/8 की स्थिति पर 0 गुण मिलते हैं — इसे भकूट दोष कहते हैं।
8. नाड़ी कूट (8 गुण)
हर नक्षत्र आदि, मध्य या अंत्य नाड़ी में आता है। दोनों की नाड़ी अलग हो तो पूरे 8 गुण, और समान हो तो 0 — इसे नाड़ी दोष कहते हैं। सबसे अधिक अंक होने के कारण इसे सबसे महत्वपूर्ण कूट माना जाता है।
नाड़ी दोष
जब वर और कन्या दोनों की नाड़ी एक ही हो, तो नाड़ी दोष बनता है। परंपरा में इसे स्वास्थ्य और संतान से जोड़कर देखा जाता है, पर यह कोई चिकित्सा निष्कर्ष नहीं है — स्वास्थ्य संबंधी चिंता के लिए डॉक्टर से सलाह लें।
परंपरागत रूप से कुछ स्थितियों में इसका परिहार माना जाता है: दोनों की राशि एक हो पर नक्षत्र अलग हों, नक्षत्र एक हो पर राशि अलग हो, या नक्षत्र एक हो पर चरण अलग हों। अलग-अलग परंपराएँ इन नियमों को अलग ढंग से लागू करती हैं।
भकूट दोष
जब दोनों की चंद्र राशियाँ एक-दूसरे से 2/12, 5/9 या 6/8 की स्थिति में हों, तो भकूट दोष बनता है। परंपरा में 2/12 को धन, 5/9 को संतान और 6/8 को स्वास्थ्य व आपसी मतभेद से जोड़ा जाता है।
दोनों राशियों का स्वामी एक ही हो (जैसे मेष–वृश्चिक, वृषभ–तुला) या दोनों के राशि स्वामी परस्पर मित्र हों, तो परंपरा में इसका परिहार माना जाता है।
अंकों से आगे
गुण मिलान केवल चंद्रमा पर आधारित है। सप्तम भाव, शुक्र, मांगलिक स्थिति और दशाएँ भी देखी जाती हैं। कोई भी अंक संबंध की सफलता की गारंटी नहीं है, और कम अंक होना अपने आप में असफलता का प्रमाण नहीं है।
शुरुआत करें
दोनों की कुंडली Astravya पर बनाएँ, फिर चार्ट तुलना पृष्ठ पर ग्रह, नक्षत्र और दशाएँ साथ-साथ देखें।
ज्योतिष पारंपरिक व्याख्या है, वैज्ञानिक निश्चितता नहीं। स्वास्थ्य, कानूनी या आर्थिक निर्णयों के लिए योग्य विशेषज्ञ से सलाह लें।