मूल नियम
परंपरा में जब मंगल लग्न, चंद्र या शुक्र से पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो कुंडली को मांगलिक कहा जाता है। अलग-अलग परंपराएँ इनमें से कुछ भावों को ही मानती हैं।
दोष भंग
कई परंपराएँ अपवाद भी बताती हैं, जैसे दोनों साथियों का मांगलिक होना या मंगल का अपनी राशि में होना। इसलिए केवल 'मांगलिक' शब्द से निष्कर्ष निकालना उचित नहीं।
आम भ्रम
बड़ी संख्या में कुंडलियाँ किसी न किसी नियम से मांगलिक निकलती हैं। मांगलिक होना कोई बीमारी या अभिशाप नहीं है, और विवाह जैसे निर्णय केवल इसके आधार पर नहीं लेने चाहिए।
यह लेख पारंपरिक ज्योतिषीय व्याख्या पर आधारित सामान्य जानकारी है, वैज्ञानिक भविष्यवाणी या पेशेवर सलाह नहीं।